नोएडा के सलारपुर गांव से सोमवार की सुबह एक बेहद दर्दनाक खबर बाहर आई. सुबह साढ़े दस बजे किसी ने फोन करके पुलिस को बताया कि सलारपुर गांव में एक स्कूल की दिवार गिर गई है, और उसके नीचे कई बच्चे दब गए हैं. हादसे में 2 बच्चों की मौत हो गई है.
खबर मिलते ही मौके पर पुलिस, फायर और नोएडा के शिक्षा विभाग के बड़े अधिकारी और डीएम पहुंच गए. उस वक्त तक गांव के लोग मलबे के नीचे दबे बच्चों को निकालने में जुटे थे, और इन लोगों ने कुछ बच्चों को निकाल भी लिया था. प्रशासन की मदद से मलबे में दबे बच्चों को बाहर निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन तब तक दो बच्चों की सांसें थम चुकी थी.
पुलिस के मुताबिक तीन बच्चों को गंभीर चोट है, बाकी बच्चों को मामूली चोटे थी, इसके बाद पुलिस ने जब जांच शुरु की तो पता लगा कि के एम पब्लिक स्कूल बिना किसी मान्यता के चल रहा थी. स्कूल पहुंचे बेसिक शिक्षा अधिकारी बालमुंकुद ने बताया कि करीब साल भर पहले इस स्कूल की मान्यता रद्द कर दी गई थी, यानी की सरकारी कागजों में ये स्कूल बंद हो चुका था, फिर भी ये स्कूल चल रहा था, और सोमवार के दिन छोटे बच्चों का परीक्षा का दिन था. इसलिए इन्हें दीवार के साथ लाइन से बिठा दिया गया था.
दीवार के सहारे जो बच्चे बैठ कर परीक्षा दे रहे थे उन्हीं में 11 साल का भूपेंद्र भी था. भूपेंद्र के पिता का कहना है कि अभी कुछ महीने पहले की उन्होंने सरकारी स्कूल से निकाल कर अपने बेटे को इस स्कूल अच्छी पढ़ाई की चाहत से यहां भर्ती किया था.
पुलिस के मुताबिक स्कूल की दीवार भी बेहद खराब हालत में थी, एक ईंट की इस दीवार की बगल वाली दीवार तो पूरी मिट्टी की बनी थी, और उसमें रेत भरा था, उस रेत को हटाने का काम सोमवार को जेसीबी की मदद से किया जा रहा था, पुलिस के मुताबिक हादसे की यही वजह है.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना की जांच के आदेश दे दिया है. उन्होंने गौतम बुद्ध नगर जिले के जिला मजिस्ट्रेट से पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन पर नजर बनाए रखने का निर्देश दिया. साथ ही घायलों को मेडिकल सुविधाएं दिलाने का ऐलान किया.
डुअल सिम (नैनो+नैनो) सपोर्ट वाला ये स्मार्टफोन एंड्रॉयड 8.1 ओरियो बेस्ड ColorOS 5.2 पर चलता है. इस स्मार्टफोन में 3GB/ 4GB रैम और ARM G72 GPU के साथ 2.1GHz ऑक्टा-कोर MediaTek Helio P70 प्रोसेसर मौजूद है. इसमें 6.3-इंच FHD+ (2340X1080) LTPS IPS (इन-सेल) LCD डिस्प्ले, 2.5D कर्व्ड ग्लास, कॉर्निंग गोरिल्ला ग्लास प्रोटेक्शन दिया गया है.
फोटोग्राफी के सेक्शन की बात करें तो इस स्मार्टफोन के रियर में दो कैमरे दिए गए हैं. इसका पहला कैमरा 13MP का है, जिसका अपर्चर f/2.2 है. वहीं दूसरा कैमरा 2MP का है, जिसका अपर्चर f/2.4 है. बैक कैमरे के साथ LED फ्लैश का सपोर्ट भी यूजर्स को मिलेगा. फ्रंट कैमरे की बात करें तो यहां कंपनी ने 25MP का कैमरा दिया है, जिसका अपर्चर f/2.0 है.
इस स्मार्टफोन में 32GB/64GB के दो स्टोरेज ऑप्शन मिलेंगे. यूजर्स इसे कार्ड की मदद से 256 GB तक बढ़ा सकते हैं. खास बात ये है कि यहां ग्राहकों को अलग से कार्ड लगाने के लिए स्लॉट भी मिलेगा. फिंगरप्रिंट सेंसर इस स्मार्टफोन के बैक पैनल पर दिया गया है. इसकी बैटरी 3500mAh की है और इसका वजन 168 ग्राम है.
Monday, December 17, 2018
Sunday, November 11, 2018
राष्ट्रवाद के नाम पर फैलायी जा रही है फ़ेक न्यूज़: बीबीसी रिसर्च
आपके फ़ोन के व्हाट्सऐप ग्रुप में भी ऐसे मैसेज आते होंगे "सभी भारतीयों को बधाई! यूनेस्को ने भारतीय करेंसी को सर्वश्रेष्ठ करेंसी घोषित किया है, जो सभी भारतीय लोगों के लिए गर्व की बात है."
ये मैसेज और इस तरह के कई दूसरे मैसेज फ़ेक होते हैं लेकिन उन्हें फ़ॉरवर्ड करने वाले लोग सोचते हैं कि वो 'राष्ट्र निर्माण' में अपनी भूमिका निभा रहे हैं.
बीबीसी के एक नए रिसर्च में ये बात सामने आई है कि लोग 'राष्ट्र निर्माण' की भावना से राष्ट्रवादी संदेशों वाली फ़ेक न्यूज़ को साझा कर रहे हैं. राष्ट्रीय पहचान ख़बरों से जुड़े तथ्यों की जांच की ज़रूरत पर भारी पड़ रहा है.
बीबीसी ने भारत, कीनिया और नाइजीरिया में व्यापक रिसर्च किया है.
ये रिपोर्ट विस्तार से समझाती है कि कैसे इनक्रिप्टड चैट ऐप्स में फ़ेक न्यूज़ फैल रही है.
ख़बरों को साझा करने में भावनात्मक पहलू का बड़ा योगदान है.
Beyond Fake news ग़लत सूचनाओं के फैलाव के ख़िलाफ़ एक अंतरराष्ट्रीय पहल है. सोमवार को (आज) इसे लॉन्च किया जा रहा है.
इस रिसर्च में ट्विटर पर मौजूद कई नेटवर्कों का भी अध्ययन किया गया और इसका भी विश्लेषण किया गया है कि इनक्रिप्टड मैसेज़िंग ऐप्स से लोग किस तरह संदेशों को फैला रहे हैं.
बीबीसी की इस रिसर्च में मदद करने के लिए कुछ मोबाइल यूजर्स ने अपने फोन का एक्सेस दिया.
इस शोध से पता चला कि भारत में लोग उस तरह के संदेशों को शेयर करने में झिझक महसूस करते हैं जो उनके मुताबिक़ हिंसा पैदा कर सकते हैं. लेकिन यही लोग राष्ट्रवादी संदेशों को शेयर करना अपना फ़र्ज़ समझते हैं.
भारत की तरक्की, हिंदू शक्ति और हिंदुओं की खोई प्रतिष्ठा की दोबारा बहाली से जुड़े संदेश, तथ्यों की जांच किए बिना बड़ी संख्या में शेयर किए जा रहे हैं. ऐसे संदेशों को भेजने वालों को लगता है कि वो राष्ट्र निर्माण का काम कर रहे हैं.
कीनिया और नाइजीरिया में भी फ़ेक न्यूज़ फैलाने के पीछे लोगों की 'फ़र्ज़ की भावना' सामने आई.
लेकिन इन दोनों देशों में राष्ट्र निर्माण की भावना की बजाय ब्रेकिंग न्यूज़ को साझा करने की भावना ज़्यादा होती है ताकि कहीं अगर वो ख़बर सच हुई तो वह उनके नेटवर्क के लोगों को प्रभावित कर सकती है.
सूचनाओं को हर किसी तक पहुँचाने की भावना यहां दिखाई पड़ती है.
मैसेज़ फॉरवर्ड करना कर्तव्य
फे़क न्यूज़ या बिना जाँच-परख के ख़बरों को आगे बढ़ाने वाले लोगों की नज़र में मैसेज या ख़बर के सोर्स से ज़्यादा अहमियत इस बात की है कि उसे उन तक किसने फ़ॉरवर्ड किया है.
अगर फ़ॉरवर्ड करने वाला व्यक्ति समाज में 'प्रतिष्ठित' है तो बिना जांचे-परखे या उस जानकारी के स्रोत का पता लगाए बिना उसे आगे पहुंचाने को वे अपना 'कर्तव्य' समझते हैं.
जिस तरह की ग़लत ख़बरें सबसे ज़्यादा फैलती हैं उनमें, भारत तेज़ी से प्रगति कर रहा है, हिंदू धर्म महान था और अब उसे दोबारा महान बनाना है, या भारत का प्राचीन ज्ञान हर क्षेत्र में अब भी सर्वश्रेष्ठ है अथवा गाय ऑक्सीजन लेती है, और ऑक्सीजन ही छोड़ती है जैसी ख़बरें सबसे ज़्यादा सामने आती हैं.
ऐसी ख़बरों को लोग हज़ारों की तादाद में रोज़ शेयर करते हैं और इसमें कोई बुराई नहीं देखते कि वे अपने मन की बात को सही साबित करने के लिए तथ्यों का नहीं बल्कि झूठ का सहारा ले रहे हैं.
वे लोग जिन पर 'फ़ेक न्यूज़' फैलाने का आरोप है
फ़र्ज़ी ख़बरों के ख़िलाफ़ बीबीसी की मुहिम: 'बियोंड फ़ेक न्यूज़'
मुख्यधारा मीडिया की साख
फे़क न्यूज़ के फैलाव में मुख्यधारा के मीडिया को भी ज़िम्मेदार पाया गया है.
रिसर्च के मुताबिक़, इस समस्या से निबटने में मीडिया इसलिए बहुत कारगर नहीं हो पा रहा है क्योंकि उसकी अपनी ही साख बहुत मज़बूत नहीं है, लोग मानते है कि राजनीतिक और व्यावसायिक हितों के दबाव में मीडिया 'बिक गया' है.
बीबीसी ने फे़क न्यूज़ फ़ैलाने वालों के वैचारिक रुझान को ट्विटर पर 16 हज़ार अकाउंट्स के ज़रिए जांचा तो ये बात सामने आई कि मोदी समर्थकों के तार आपस में बेहतर ढंग से जुड़े हुए हैं और वे एक तरह से मिल-जुलकर एक अभियान की तरह काम कर रहे हैं.
ये मैसेज और इस तरह के कई दूसरे मैसेज फ़ेक होते हैं लेकिन उन्हें फ़ॉरवर्ड करने वाले लोग सोचते हैं कि वो 'राष्ट्र निर्माण' में अपनी भूमिका निभा रहे हैं.
बीबीसी के एक नए रिसर्च में ये बात सामने आई है कि लोग 'राष्ट्र निर्माण' की भावना से राष्ट्रवादी संदेशों वाली फ़ेक न्यूज़ को साझा कर रहे हैं. राष्ट्रीय पहचान ख़बरों से जुड़े तथ्यों की जांच की ज़रूरत पर भारी पड़ रहा है.
बीबीसी ने भारत, कीनिया और नाइजीरिया में व्यापक रिसर्च किया है.
ये रिपोर्ट विस्तार से समझाती है कि कैसे इनक्रिप्टड चैट ऐप्स में फ़ेक न्यूज़ फैल रही है.
ख़बरों को साझा करने में भावनात्मक पहलू का बड़ा योगदान है.
Beyond Fake news ग़लत सूचनाओं के फैलाव के ख़िलाफ़ एक अंतरराष्ट्रीय पहल है. सोमवार को (आज) इसे लॉन्च किया जा रहा है.
इस रिसर्च में ट्विटर पर मौजूद कई नेटवर्कों का भी अध्ययन किया गया और इसका भी विश्लेषण किया गया है कि इनक्रिप्टड मैसेज़िंग ऐप्स से लोग किस तरह संदेशों को फैला रहे हैं.
बीबीसी की इस रिसर्च में मदद करने के लिए कुछ मोबाइल यूजर्स ने अपने फोन का एक्सेस दिया.
इस शोध से पता चला कि भारत में लोग उस तरह के संदेशों को शेयर करने में झिझक महसूस करते हैं जो उनके मुताबिक़ हिंसा पैदा कर सकते हैं. लेकिन यही लोग राष्ट्रवादी संदेशों को शेयर करना अपना फ़र्ज़ समझते हैं.
भारत की तरक्की, हिंदू शक्ति और हिंदुओं की खोई प्रतिष्ठा की दोबारा बहाली से जुड़े संदेश, तथ्यों की जांच किए बिना बड़ी संख्या में शेयर किए जा रहे हैं. ऐसे संदेशों को भेजने वालों को लगता है कि वो राष्ट्र निर्माण का काम कर रहे हैं.
कीनिया और नाइजीरिया में भी फ़ेक न्यूज़ फैलाने के पीछे लोगों की 'फ़र्ज़ की भावना' सामने आई.
लेकिन इन दोनों देशों में राष्ट्र निर्माण की भावना की बजाय ब्रेकिंग न्यूज़ को साझा करने की भावना ज़्यादा होती है ताकि कहीं अगर वो ख़बर सच हुई तो वह उनके नेटवर्क के लोगों को प्रभावित कर सकती है.
सूचनाओं को हर किसी तक पहुँचाने की भावना यहां दिखाई पड़ती है.
मैसेज़ फॉरवर्ड करना कर्तव्य
फे़क न्यूज़ या बिना जाँच-परख के ख़बरों को आगे बढ़ाने वाले लोगों की नज़र में मैसेज या ख़बर के सोर्स से ज़्यादा अहमियत इस बात की है कि उसे उन तक किसने फ़ॉरवर्ड किया है.
अगर फ़ॉरवर्ड करने वाला व्यक्ति समाज में 'प्रतिष्ठित' है तो बिना जांचे-परखे या उस जानकारी के स्रोत का पता लगाए बिना उसे आगे पहुंचाने को वे अपना 'कर्तव्य' समझते हैं.
जिस तरह की ग़लत ख़बरें सबसे ज़्यादा फैलती हैं उनमें, भारत तेज़ी से प्रगति कर रहा है, हिंदू धर्म महान था और अब उसे दोबारा महान बनाना है, या भारत का प्राचीन ज्ञान हर क्षेत्र में अब भी सर्वश्रेष्ठ है अथवा गाय ऑक्सीजन लेती है, और ऑक्सीजन ही छोड़ती है जैसी ख़बरें सबसे ज़्यादा सामने आती हैं.
ऐसी ख़बरों को लोग हज़ारों की तादाद में रोज़ शेयर करते हैं और इसमें कोई बुराई नहीं देखते कि वे अपने मन की बात को सही साबित करने के लिए तथ्यों का नहीं बल्कि झूठ का सहारा ले रहे हैं.
वे लोग जिन पर 'फ़ेक न्यूज़' फैलाने का आरोप है
फ़र्ज़ी ख़बरों के ख़िलाफ़ बीबीसी की मुहिम: 'बियोंड फ़ेक न्यूज़'
मुख्यधारा मीडिया की साख
फे़क न्यूज़ के फैलाव में मुख्यधारा के मीडिया को भी ज़िम्मेदार पाया गया है.
रिसर्च के मुताबिक़, इस समस्या से निबटने में मीडिया इसलिए बहुत कारगर नहीं हो पा रहा है क्योंकि उसकी अपनी ही साख बहुत मज़बूत नहीं है, लोग मानते है कि राजनीतिक और व्यावसायिक हितों के दबाव में मीडिया 'बिक गया' है.
बीबीसी ने फे़क न्यूज़ फ़ैलाने वालों के वैचारिक रुझान को ट्विटर पर 16 हज़ार अकाउंट्स के ज़रिए जांचा तो ये बात सामने आई कि मोदी समर्थकों के तार आपस में बेहतर ढंग से जुड़े हुए हैं और वे एक तरह से मिल-जुलकर एक अभियान की तरह काम कर रहे हैं.
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